आचार्य श्री १०८ समयसागरजी महाराज - जीवन परिचय

आचार्य परंपरा की अखंड ज्योति के संवाहक आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज का सम्पूर्ण जीवन आत्मसंयम, कठोर साधना और निष्कलंक गुरु-भक्ति की एक दिव्य तपोयात्रा है। उनका प्रत्येक चरण अपने परम पूज्य गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सान्निध्य, मार्गदर्शन और करुणा से अनुप्राणित रहा।

27 अक्टूबर 1958 (आश्विन शुक्ल शरद पूर्णिमा, वीर निर्वाण संवत 2484) को कर्नाटक के सदलगा नामक पावन ग्राम में इस तेजस्वी आत्मा का जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही वैराग्य और आत्मचिंतन उनके व्यक्तित्व में स्पष्ट था। मात्र सत्रह वर्ष की आयु में, महावीरजी (राजस्थान) की पुण्यभूमि पर 02 मई 1975 (वीर निर्वाण संवत 2501) को आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ने उन्हें ब्रह्मचर्य व्रत प्रदान किया, जिससे उनका जीवन साधना-पथ पर प्रतिष्ठित हुआ। इसके पश्चात 18 दिसंबर 1975 को सोनागिरि (मध्य प्रदेश) में आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज द्वारा क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की गई, 31 अक्टूबर 1978 को नैनागिरि (मध्य प्रदेश) में आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज द्वारा ऐलक दीक्षा प्रदान की गई, तथा 08 मार्च 1980 को द्रोणगिरि (मध्य प्रदेश) की तपोभूमि पर आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी ने मुनि दीक्षा प्रदान कर उन्हें मुनि श्री समयसागर जी महाराज के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।

दीर्घकालीन कठोर तप, अनुपम त्याग और अविचल साधना के उपरांत 29 नवम्बर 2018 को ललितपुर (उत्तर प्रदेश) में आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज द्वारा निर्यापक श्रमण अवस्था प्रदान की गई, जो उनकी साधना की उच्चतम उपलब्धियों में से एक थी। अंततः,16 अप्रैल 2024 (वीर निर्वाण संवत 2550) को कुंडलपुर (मध्य प्रदेश) की पावन धरा पर आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आदेश अनुसार आचार्य पद प्रदान कर, उन्हें जैन आचार्य परंपरा के सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित किया गया। यह गौरवपूर्ण क्षण सम्पूर्ण जैन समाज के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित रहेगा।

आचार्य श्री समयसागर जी महाराज की तपस्वी जीवन यात्रा

श्री शांतिनाथ जी अष्टगे जन्म:

आश्विन शुक्ल, शरद पूर्णिमा, वी. सं. २४८४
(27 अक्टूबर 1958) – सदलगा, कर्नाटक

श्री शांतिनाथ जी अष्टगे ब्रह्मचर्य व्रत:

वैशाख कृष्ण सप्तमी, वी. सं. २५०१
(02 मई 1975) – महावीर जी, राजस्थान
उम्र: १७ वर्ष

क्षुल्लक समयसागर जी जन्म:

मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा, वी. सं. २५०२
(18 दिसंबर 1975) – सोनागिरि, मध्य प्रदेश
उम्र: १७ वर्ष

एलक समयसागर जी जन्म:

कार्तिक कृष्ण अमावस्या, वी. सं. २५०४
(31 अक्टूबर 1978) – नैनागिरि, मध्य प्रदेश
उम्र: २० वर्ष

मुनि समयसागर जी जन्म:

चैत्र कृष्ण षष्ठी, वी. सं. २५०६
(08 मार्च 1980) – द्रोणगिरि, मध्य प्रदेश
उम्र: २२ वर्ष

निर्यापक श्रमण समयसागर जी जन्म:

मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी, वी. सं. २५४५
(29 नवम्बर 2018) – ललितपुर, उत्तर प्रदेश
उम्र: ६० वर्ष

आचार्य समयसागर जी जन्म:

चैत्र शुक्ल अष्टमी, वी. सं. २५५०
(16 अप्रैल 2024) – कुंडलपुर, मध्य प्रदेश
उम्र: ६६ वर्ष

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज संयम, तप और त्याग की साक्षात् मूर्ति थे। उनका सम्पूर्ण जीवन आत्मशुद्धि और लोककल्याण की भावना से अनुप्राणित रहा, और यह दिव्य व्यक्तित्व अपने परम पूज्य गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की करुणा, दृष्टि और तपस्वी परंपरा का सशक्त प्रतिफल था।

शरद पूर्णिमा जैसे पावन दिन, वीर निर्वाण संवत 2472 (10 अक्टूबर 1946) को कर्नाटक के बेलगाम जिले के सदलगा नामक पुण्य ग्राम में इस तेजस्वी आत्मा का जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही उनके व्यक्तित्व में जो अलौकिक गंभीरता, वैराग्य और आत्मचिंतन परिलक्षित होता था, वह मानो इस तथ्य का संकेत था कि यह आत्मा संसार के लिए नहीं, मोक्ष-पथ के लिए अवतरित हुई है। वीर निर्वाण संवत 2494 (30 जून 1968) को अजमेर की पवित्र भूमि पर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने उन्हें मुनि दीक्षा प्रदान की। यह केवल दीक्षा नहीं थी, बल्कि एक महान आचार्य द्वारा अपने योग्य उत्तराधिकारी को संयम, तप और साधना की अखंड परंपरा सौंपे जाने का पावन क्षण था। उसी क्षण से उनका जीवन एक दिव्य तपोयात्रा में रूपांतरित हो गया। गुरुकृपा से प्राप्त इस दीक्षा के उपरांत, आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने मात्र चार वर्षों के भीतर वीर निर्वाण संवत 2498 (22 नवंबर 1972) को नसीराबाद (राजस्थान) में उन्हें आचार्य पद प्रदान कर,

जैन परंपरा की सर्वोच्च जिम्मेदारी उनके कंधों पर स्थापित की। यह आचार्य पद केवल सम्मान नहीं, बल्कि गुरु द्वारा सौंपा गया एक महान उत्तरदायित्व था जिसे आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने आजीवन पूर्ण निष्ठा से निभाया। गुरु द्वारा प्रदान किए गए इस दायित्व को उन्होंने अपनी साधना, तप और साहित्य के माध्यम से जीवंत किया। निरंजना शतक, भावना शतक, परिशह जया शतक, सुनीति शतक और मूक माटी जैसी अनुपम रचनाएँ उनकी उसी गुरु-परंपरा की वाणी हैं, जो आज भी साधकों को आत्मशुद्धि और संयम की दिशा में प्रेरित करती हैं। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज से प्राप्त परंपरा के अनुरूप, उन्होंने अपने सान्निध्य में कई मुनियों, आर्यिकाओं, ऐलकों और क्षुल्लकों को दीक्षा प्रदान कर जैन साधना की अखंड धारा को आगे बढ़ाया। वीर निर्वाण संवत 2550, माघ शुक्ल अष्टमी (18 फरवरी 2024) का वह अलौकिक क्षण, जब आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने तप, संयम और आत्मसाधना की दिव्य यात्रा को पूर्णता प्रदान की। यह अंत नहीं था यह उसी गुरु-परंपरा में आत्मा का परम शुद्धि में विलीन हो जाना था, जो उन्हें आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज द्वारा प्रदान की गई थी। जैसे एक दीपक अपने प्रकाश को अनंत ज्योति में समर्पित कर देता है, वैसे ही उन्होंने स्वयं को परम सत्य में अर्पित कर दिया। आज भी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का जीवन, उनका तप और उनका संयम वस्तुतः आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की साधना परंपरा का जीवंत प्रकाश है। यह प्रकाश आज भी अनगिनत साधकों के हृदय में भक्ति, जागृति और आत्मबल का आलोक बिखेर रहा है।